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पैदा होने के साथ ही बच्चे तेजी से सीखने लगते हैं। अगर उन्हें पौष्टिक भोजन और सेहत की सही देखभाल के साथ दुलार, ध्यान और शाबासी मिले तो वे तेजी से बढ़ते हैं और जल्दी सीखते हैं।

पैदा होने के साथ ही बच्चे तेजी से सीखने लगते हैं। अगर उन्हें पौष्टिक भोजन और सेहत की सही देखभाल के साथ दुलार, ध्यान और शाबासी मिले तो वे तेजी से बढ़ते हैं और जल्दी सीखते हैं।

अपने से चिपका कर रखना और पैदा होने के एक घंटे के भीतर बच्चे को मां का दूध पिलाना, शिशुओं की बेहतर वृद्धि और विकास में मदद करता है तथा मां के साथ बच्चे का खास रिश्ता कायम करता है।

छूना, सुनना, सूंघना, देखना तथा चखना, सीखने के वह औजार हैं, जिनसे बच्चा अपने आसपास की दुनिया को परखने की कोशिश करता है।

जब बच्चों से बात की जाती है, उन्हें छुआ जाता है और गले लगाया जाता है, और जब वे जाने-पहचाने चेहरे देखते हैं, परिचित आवाजें सुनते हैं और तरह-तरह की चीजें थामते हैं तो उनका दिमाग तेजी से बढ़ता है।

जन्म से ही जब वे प्यार और सुरक्षा का अनुभव करते हैं और जब लगातार खेलते हैं और परिवार के लोगों से घुलते-मिलते हैं, तो तेजी से सीखते हैं। सुरक्षा का अनुभव करने वाले बच्चे आमतौर पर स्कूल में अव्वल होते हैं और जीवन की कठिनाइयों का सामना आसानी से करते हैं।

मांगे जाने पर पहले छह माह तक केवल मां का दूध, छह माह की उम्र पर सुरक्षित और पौष्टिक भोजन मिलने की सही समय पर शुरुआत, और दो साल या उससे ज्यादा समय तक मां के दूध का सेवन बच्चे को पोषण और स्वास्थ्य लाभ उपलब्ध कराता है, साथ ही साथ देखभाल करने वालों से लगाव और संबंध बनाता है।

बच्चों के लिए विकास और सीख का सबसे जरूरी रास्ता दूसरों से उनका मेलजोल होता है। माता-पिता और देखभाल करने वाले बच्चे के साथ जितनी बातें करेंगे और उस पर ध्यान देंगे, बच्चा उतनी ही तेजी से सीखेगा। नवजात और छोटे बच्चों के सामने माता-पिता और देखभाल करने वालों को बात करना, पढ़ना और गाना चाहिए। बच्चे अगर शब्द समझने लायक न हों तो भी यह ‘बातचीत’ उनकी भाषा और सीखने की क्षमता का विकास करती है।

देखभाल करने वाले बच्चों को देखने, सुनने, पकड़ने और खेलने के लिए नयी और दिलचस्प चीजें देकर उनके सीखने और बढ़ने में मदद कर सकते हैं।

शिशुओं और छोटे बच्चों को लंबे समय के लिए अकेले नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास की गति को धीमा कर देता है।

लड़कियों को भी भोजन, ध्यान, लगाव और देखभाल की उतनी ही जरूरत होती है, जितनी लड़कों को। सीखने या कुछ नया कहने पर सभी बच्चों को बढ़ावा और उनकी तारीफ किये जाने की जरूरत है। अगर बच्चे की शारीरिक या मानसिक बढ़त ठीक से नहीं हो रही है तो माता-पिता को स्वास्थ्य कार्यकर्ता से सलाह लेने की जरूरत है।

मातृभाषा में बच्चों का शिक्षण सबसे पहले उन्हें सोचने और खुद को व्यक्त करने की क्षमता के विकास में मदद करता है। गानों, नानी-दादी की कहानियों, कविताओं और खेलों के जरिये बच्चे भाषा को जल्दी और आसानी से सीखते हैं।

जिन बच्चों का समय से टीकाकरण पूरा हुआ हो और जिन्हें पर्याप्त पोषण मिल रहा हो, उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है तथा उनमें घुलने-मिलने, खेलने-कूदने और सीखने का रूझान अधिक होता है। यह स्वास्थ्य पर परिवार के खर्च, बीमारी के कारण स्कूल से बच्चे की गैर हाजिरी और बीमार बच्चे की देखभाल में माता-पिता की आमदनी के नुकसान को कम करेगा।